Tuesday, April 14, 2009

गर्मी की दोपहरी थी
पसीने से लथपथ ,बोझिल ...
...कुछ ताजे हवा के झोंकें ने मुझे बाहर निकलने को विवश किया
बाहर जाने पर गावं की पगडंडियों ने जहाँ ले जाना चाहा ,मुझे मै गई ....
देखा तो
खेत खलिहानों में सूखे पैरो के ढेर ,वृक्ष के निचे मवेशियों के झुंड आराम कर रहे थे .....
वही पलाश के फूलों ने दूर-दूर तक जंगल में मखमली लाल आसमा बिछा रखा था ....
एक वही था जो मुस्कुरा रहा था उस भरी गर्मी में ....और
प्रेरित किया मुझे मुस्कुराने के लिए ,घर लौट जाने के लिए और हर मौसम में खिलखिलाने के लिए .......

न तू बड़ा न मै ...

एक दुसरे से लड़ लड़ कर ,इंसान इंसान को भूल जाता है ...
हिंदू मुस्लिम से और मुस्लिम इसाई से ,अंदर ही अंदर घृणा करता है ...
एक ने कहा तेरी जात छोटी है ,तू बड़ा नही हो सकता ...
दूजे ने कहा तेरी औकात छोटी है ,तू बड़ा नही हो सकता ॥
इसी जद्दोजहद में एक दुसरे की टांग खिची ...
न बढ़ सके ख़ुद, न बढ़नें दिया किसी को .....
क्योंकि वो जमीं पे थे गड्ढा खोदने में व्यस्त .....
एक दिन जब मौत आई .....तब आत्मा ने कहा ....
न तू बड़ा न मै बड़ा ....
हर किसी को एक गज जमीं ही चाहिए अंत में समाने के लिए ...............

Monday, March 30, 2009

बचपन

तितलियाँ पकड़ कर पुस्तक में दबाना .......
मोरे पंख के दुगने होने की उम्मीद से पन्नों में सजाना ....
चिड़ियों के लिए घोसला बनाना .....स्कूल बस्ते में भरे खाना खजाना ....
और उन्मुक्त गलियों में गाना बजाना ...
गुड्डे गुडियों की शादी कराना ...
......बिना कल की चिंता किए सो जाना॥
इंसान बचपन सा जिए अगर पुरी जिंदगी .....तो कितना आसान है ....ये सफर कट जाना......

सिसकी

दूर कहीं कोने में बैठा कोई सिसकियाँ ले रहा था ....
मेरे जमीर ने मुझसे कहा -जाओ शायद तुम्हारा उनसे परिचय हो ,
और तुम किसी को सिसकियों से मुक्त करा सको ....
मै करीब गई तो बेबस ,हारे हुए इंसान के साथ `सिसकी `थी .....
वो चाह कर भी इंसान को छोड़ नही पा रही थी ....
क्यों ???
इंसान का मनोबल ही जब टूट चुका हो ....
इंसान स्वयम जब खुद से हारना चाहे ....
इंसान जब अपने ही भावनाओं के अधीन हो ,
तो गम ,, यहाँ तक हार भी उसे छोड़ना नही चाहती ....

Tuesday, June 10, 2008

मेरा प्यार ....

मेरा मन करना चाहता है हजारों बातें ....
आँखें तलाशती है तुम्हे ,हर पल हर जगह
चाहती है बयां करना तुमसे ,मेरे मन की गहराइयों में छुपे असीम प्यार को
सोचती हूँ वीना के तार जो तुमने छेड़ दिए हैं
कैसे शांत करूं ,कैसे सुनाऊँ
या राग छेड़ दूँ प्यार का
कैसे रोकूँ ह्रदय के स्पंदन को
क्या पता तुम भी मचलते हो या नहीं मेरा सानिध्य पाने को ?
या यूँ ही एक आकर्षण है मेरा प्यार
या बचकानेपन का एक अरमां ही है तुम्हे पाने का
क्या तुम भी डरते हो हमारा प्यार बताने मे जमाने को
चाहे जो भी इसका लक्ष्य या अंजाम
ये मेरा प्यार न कभी हो बदनाम
बस समंदर की तरह सहेजूंगी
नही बयां करुँगी ,,न तुम्हे और न ज़माने को

कौन आया है मेरे कब्र पर ......

कौन आया है मेरे कब्र पर ...की मौत ने मेरे मुझे मजार बना दिया
जीते जी तो समझ न सके मुझे
की मौत को भी मेरे उधार बना दिया
झंझावातों को झेलती चली गई
क़दमों की लकीर मिटती चली गई
शान्ति से मर भी नही सकती
की मौत को भी मेरे त्यौहार बना दिया
भावनाओं को मार कर तरक्की की बात करते है वो
की मेरी आंसूं भरी आंखों को भी ,,सुखा सुना निर्जीव संसार बना दिया
कुरेदते रहे मेरे मन के महीन जख्मों को
की सुलग रही थी मैं अंगार बना दिया
आंखों से बरसती थी प्यार की बूंदें
पल्लवित होता था स्नेह के तले
कोटी कोटी भावनाएं इस संसार के लिए
की जला जला के उन्होनें मुझे थार बना दिया .....


जला जला के मुझे उन्होनें 'थार ' बना दिया

मुझे प्यार दो या बिसार दो......

मैं भी संवर सकूं , निखर सकूं
मेरे साथ-साथ ही चला करो
मेरा हाथ ही क्यों न थाम लो
मैं सहम चुकी हूँ बहार से
मुझे प्यार दो मुझे प्यार दो
ना ही दूर मुझसे रहा करो
तुम क्यों न मेरा ही साथ दो
मुझे मंजिलों की तलाश है
मुझे मीत अपना ही मान लो
मुझे प्यार दो मुझे प्यार दो
जो मैं चली गई तो फिर न आऊंगी
की मुझे गम भी उनका अज़ीज़ है
मुझे अपने हाथ का सहार दो
मेरी जिंदगी को संवार दो
मुझे थाम लो मुझे रोक लो
मुझे प्यार दो या बिसार दो